मंगलवार, 27 सितंबर 2022

Durga Stuti 1 Adhayay

 दुर्गा स्तुति का पहला अधयाय  


पहला आधाय

दोहा:- वन्दे गौरी गणपति शंकर और हनुमान ।

          राम नाम प्रभाव से है सब का कल्याण ।

गुरुदेव के चरणों की रज मस्तक पे लगाऊ ।

शारदा माता की कृपा लेखनी का वर पाऊ ।

नमो नारायण दास  जी विप्रन  कुल श्रृंगार ।

पूज्य पिता की कृपा से उपजे शुद्ध विचार ।

वन्दु संत समाज को वंदु भगतन भेख ।

जिनकी संगत से हुए उलटे सीधे लेख ।

आदि शक्ति की वंदना करके शीश नवाऊ ।

सप्तशती के पाठ की भाषा सरल बनाऊ ।

       क्षमा करे विद्वान सब जान मुझे अनजान ।

       चरणों की रज चाहता बालक 'संजय' 'चमन' नादान ।

घर घर दुर्गा पाठ का हो जाए प्रचार ।

आदि शक्ति की भक्ति  से होगा बेडा पार ।

कलयुग कपट कियो निज डेरा, कर्मो के वश कष्ट घनेरा ।

        चिंता अगन में  निस दिन जरही ।

        प्रभु का सिमरन कबहू ना करही ।

        यह स्तुति लिखी तिनके कारण ।

        दुःख नाशक और कष्ट निवारण ।

        मारकंडे ऋषि करे बखाना ।

        संत सुनाई लावे निज ध्यान ।

        स्वोर्चित नामक मन्वन्तर में ।

        सुरथ  नामी राजा जग भर में ।

राज करत जब पड़ी लड़ाई, युद्ध मे मरी सभी कटकाई ।

राजा प्राण लिए तब भागा , राज कोष परिवार त्यागा ।

सचिवन बांटेयो सभी खजाना, राजन यह मर्म यह बन मे जाना ।

सुनी खबर अति भओ उदासा , राजपाठ से हुआ निराशा ।

भटकत आयो इकबन माहि , मेधा मुनि के आश्रम जाहि ।

         मेधा मुनि का आश्रम था कल्याण निवास ।

         रहने लगा सुरत वह बन संतन का दस ।

         इक दिन आया राजा को अपने राज्य का ध्यान ।

         चुपके आश्रम से निकला पह्चा बन मे आन ।

मन में शोक अति पूजाए, निज नैन से नीर बहाए ।

पुरममता अति ही दुःख लागा, अपने आपको जान अभागा ।

मन मे राजन करे विचार, कर्मन वश पायो दुःख भारा ।

रहे न नौकर आज्ञाकारी, गई राजधानी भी सारी।

विधान्मोहे भओ विपरीत, निष् दिन रहू विपन भेहवीता ।

देव करोगे कबहुँ सुहाही , काटो मोरे विपदा सिर आई ।

सोचत सोच रह्यो भुआला, आयो वैश्य एक्तेही काला ।

तिनराजा  को कीं प्रणाम , वैश्य समाधि कह्यो निज नामा ।

दोहा:- राजा कहे समाधि से कारन दो बतलायो ।

          दुखी हुए मन मलीन से क्यों इस वन मे आये ।

          आह भरी उस वश्य ने बोला हो बेचैन ।

           सुमरिन कर निज दुःख का भर आये जलनैन ।

वैश्य कष्ट मन का कह डाला, पुत्रो ने है घर से निकला ।

छीन लियो धन सम्पति मेरी , मोरी जान विपद  ने घेरी ।

घर से धक्के खा वन आया, नारी ने भी दगा कमाया ।

सम्बन्धी स्वजन सब त्यागे , दुःख पावेंगे जीव अभागे ।

फिर भी मन मे धीर ना आवे, ममतावश हर दम  कल्पावे ।

दोहा:-मेरे रिश्तेदारों ने किया नीचो का काम ।

         फिर भी उनके बिना ना आये मुझे आराम ।

सुरथ  ने कहा मेरा भी ख्याल ऐसा ।

तुम्हारा हुआ माम्तावश हाल जैसा ।

        चले दोनों दुखिया मुनि आश्रम आये ।

        चरण सर नव कर वचन ये सुनाये ।

ऋषिराज कर कृपा बतलायेगा ।

हमे भेद जीवन का समझाइए गा ।

जिन्होंने हमारा निरादर किया है ।

हमे हर जगह ही बेआदर किया है ।

        लिया छीन धन और सर्वस्य है जो ।

        किया खाने तक से भी बेबस है जो ।

ये मन फिर भी क्यों उनको अपनाता है ।

उन्ही के लिए क्यों यह घबराता है ।

       हमारा यह मोह तो छुड़ा दीजिये गा ।

       हमे अपने चरणों मे लगा लीजिये गा ।

बिनती उनकी मान कर , मेधा ऋषि सुजान ।

उनके धीरज के लिए कहे यह आत्म ज्ञान ।

यह मोह ममता अति दुखदाई, सदा रहे जीवो मे समाई ।

पशु पक्षी नर देव गंधर्व , माम्तावश पावे दुःख सर्वा ।

गृह सम्बन्धी पुत्र और नारी, सब ने ममता झूठी डारी ।

यदपि झूठ मगर ना छूटे, इसी के कारन कर्म है फूटे ।

ममता वश चिड़ी चोगा चुगावे, भूखी रहे बच्चो को खिलावे ।

ममता ने बांधे सब प्राणी, ब्राह्मण डोम ये राजा रानी ।

ममता ने जग को बौराया, हर प्राणी का ज्ञान भुलाया ।

ज्ञान बिना हर जीव दुखारी , आये सर पर विपदा भारी ।

तुमको ज्ञान यथार्थ नाही, तभी तो दुःख मानो मनमाही ।

दोहा:- पुत्र करे माँ बाप को लाख बार धिक्कार ।

          मात पिता छोड़े नहीं फिर झूठा प्यार ।

          योग निंदा इसी को ममता का है नाम ।

          जीवो को कर रखा है इसी ने बे आराम ।

भगवान् विष्णु की शक्ति यह, भगतो की खातिर भगति यह ।

महामाया नाम धराया है . भगवती का रूप बनाया है ।

ज्ञानियो के मन को हरती है, प्राणियो को बेबस करती है ।

यह शक्ति मन भरमाती है, यह ममता मे फंसाती है ।

यह जिस पर कृपा करती है, उसके दुखो को हरती है ।

जिसको देती वरदान है यह, उसकी करती कल्याण है यह ।

यही ही विद्या कहलाती है ,अविद्या भी बन जाती है ।

संसार को तारने वाली है ,यह ही दुर्गा महाकाली है ।

सम्पूर्ण जग की मालक है ,यह कुल सृष्टि की पालिक है ।

दोहा:- ऋषि ने पूछा राजा ने कारन तो बतलाओ ।

          भगवती की उत्पति का भेद हमें समझाओ ।

          मुनि मेधा बोले सुनो ध्यान से ।

          मग्न निंदा मे विष्णु भगवान थे ।

          थे आराम से शेष शैया पे वो ।

         मगन असुर मधु - कैटभ वह प्रगटे दो ।

श्रवण मैल से प्रभु की लेकर जन्म ।

लगे ब्रह्मा जी को वो करने खत्म ।

       उन्हें देख ब्रह्मा जी घबरा गए ।

       लखी निंद्रा प्रभु की तो चकरा गए ।

तभी मग्न मन ब्रह्मा स्तुति करी ।

की इस योग निंद्रा को त्यागो हरी ।

      कहा शक्ति निंद्रा तू बन भगवती ।

       तू स्वाहा तू अम्बे तू सुख सम्पति ।

तू सावित्री संध्या विश्व आधार तू ।

है उत्पति पालन व संहार तू ।

       तेरी रचना से ही यह संसार है ।

        किसी ने ना पाया तेरा पार है ।

गदा शंख चक्र पदम  हाथ ले ।

तू भगतो का अपने सदा साथ दे ।

महामाया तब चरण ध्याऊ, तुमरी कृपा अभे पद पाऊ ।

ब्रह्मा विष्णु शिव उपजाए, धारण विविध शरीर कर आये ।

तुमरी स्तुति की ना जाए, कोई ना पार तुम्हारा पाए ।

मधु कैटभ मोहे मारन आये, तुम बिन शक्ति कौन बचाए ।

प्रभु के नेत्र से हट जाओ, शेष शैया से इन्हें जगाओ ।

असुरो पर मोह ममता डालो, शरणागत को देवी बचा लो ।

सुन स्तुति प्रगटी महामाया, प्रभु आँखों से निकली छाया ।

तामसी देवी नाम धराया , ब्रह्मा खातिर प्रभु जगाया ।

दोहा:- योग निंद्रा के हटते ही प्रभु उगाड़े नैन।

मधु कैटभ को देखकर बोलो क्रोधित बैन ।

ब्रह्मा मेरा अंश है मार सके ना कोय ।

मुझ से बल अजमाने को लड़ देखो तुम दोए ।

         प्रभु गदा लेकर उठे करने दैत्य संघार ।

         पराक्रमी योद्धा लादे वर्ष वो पांच हजार।

तभी  देवी महामाया ने दत्यो के मन भरमाये ।

बलवानो के ह्रदय मे दिया अभिमान जगाये ।

        अभिमानी कहने लगे सुन विष्णु धर ध्यान ।

        युद्ध से हम प्रसन् है मांगो कुछ वरदान ।

प्रभु थे कौतक कर रहे बोले इतना हो ।

मेरे हाथो से मरो वचन मुझे यह दो ।

        वचन बध्य वह राक्षस जल को देख अपार ।

       काल से बचने के लिए कहते शब्द उच्चार ।

जल ही जल चहुँ और है ब्रह्मा कमल बिराज ।

मारना चाहते हो हमे सो सुनिए महाराज ।

       वध कीजिए उस जगह पे जल न जहाँ दिखाये ।

       प्रभु ने इतना सुनते ही जांघ पे लिया लिटाये ।

चक्र सुदर्शन से दिए दोनों के सर काट ।

खुले नैन रहे दोनों के देखत प्रभु की बाट ।

     ब्रह्मा जी की स्तुति सुन प्रगटी महामाया ।

     पाठ पढ़े जो प्रेम से उसकी करे सहाय ।

शक्ति के प्रभाव का पहला यह अध्याय ।

'चमन' पाठ कारण लिखा सहजे शब्द बनाया ।

      श्रधा भगति से करो शक्ति का गुणगान ।

      ऋद्धि सीधी नव निधि दे करे दाती कल्याण ।


बोलो जय माता दी। 

जय मेरी माँ वैष्णो रानी की। 

जय मेरी माँ राज रानी की। 


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